जम्मू के मिनी कश्मीर भदेरवाह की सोलो ट्रिप

Tripoto

श्रेय : ट्रिप एडवाइजर 

Photo of जम्मू के मिनी कश्मीर भदेरवाह की सोलो ट्रिप by Aastha Raj

हर भारतीय की ख्वाहिश होती है कि वो एक बार जम्मू कश्मीर ज़रूर घूमने जाये और मैं उन खुशकिस्मत लोगों में से एक थी जिसने अपनी ग्रेजुएशन की पढाई जम्मू में की थी। जम्मू की खूबसूरती, हर दिन ज़मीन पर आते बादल, पहाड़ और बादलों की लुका छिपी, रंग बिरंगे फूल और ठंडी हवा, चार साल इन सबके साथ रहने के बाद जम्मू शहर मेरे अन्दर बस चूका था। जम्मू के आस पास की खूबसूरती भी मैंने कॉलेज के दोस्तों के साथ देख ली थी पर कॉलेज ख़त्म होने तक जो एक जगह मैं नहीं देख पायी थी वो थी भदेरवाह। जम्मू शहर को छोड़े 2 वर्ष हो चुके थे और जब भी भदेरवाह की तस्वीरें देखती थी मन में एक मलाल रहता था की मैं वहाँ क्यूँ नहीं गयी ।

जम्मू के डोडा जिले में बसा भदेरवाह मेरे एक कॉलेज के दोस्त का घर भी था और वो आम तौर पर इंसटाग्राम पर भदेरवाह की तस्वीरें डालता रहता था जो उसके नाम को बिलकुल सही साबित करती थी कि वो मिनी कश्मीर ही है। ऐसी खुबसूरत तस्वीरें और विडियो देखकर मेरा हर दिन मन करता था कि ऑफिस से छुट्टी लेकर 2 दिन के लिए ही सही पर उस जन्नत का अनुभव मैं भी कर आऊं और आखिरकार वो दिन आ गया। मुझे 3 दिन की छुट्टी मिली और मैंने बिना सोचे दिल्ली से उधमपुर वाया जम्मू की ट्रेन की टिकट ले ली। उधमपुर से भदेरवाह 120 किलोमीटर की दूरी पर है जबकि जम्मू से 207 किलोमीटर इसलिए मैंने उधमपुर जाना सही समझा।

रात की ट्रेन थी इसलिए अगली सुबह मैं उधमपुर पहुँच चुकी थी। मैंने पहले से ही ऑनलाइन होटल बुक कर रखा था इसलिए मैंने वहाँ की टैक्सी सर्विस का इस्तेमाल किया और वहाँ से होटल चली गयी। वैसे तो मैं कॉलेज के वक़्त कई बार उधमपुर आई थी पर 2 साल बाद यहाँ आकर फिर से ताज़गी का एहसास हो रहा था। वहाँ पहुँच कर मैंने जम्मू का मशहूर कल्हाड़ी कुल्चा खाया जो मुझे कॉलेज के वक़्त से ही बेहद पसंद था। थोड़े देर होटल में आराम कर के मैंने उधमपुर से भदेरवाह के लिए टैक्सी सर्विस का पता किया और शाम को निकलने के लिए तैयार हो गयी। मैं अपने भदेरवाह वाले दोस्त को सरप्राइज देना चाहती थी इसलिए मैंने उसे अपनी ट्रिप के बारे में पहले नहीं बताया था। मैं 3 घंटे में उसके घर पहुँच गयी थी। वैसे तो मैंने अपने लिए होटल बुक किया था पर उसके और उसकी मम्मी के कई बार कहने पर मैं उस रात वहीं रुक गयी। उस रात मैंने आंटी के हाथ का बना स्वादिष्ट राजमा चावल खाया जो जम्मू के लोगो के लिए स्पेशल पकवान है। मैंने अपने दोस्त को पहली ही बता दिया था कि मैं भदेरवाह अकेले घूमना चाहती हूँ और वो राज़ी भी हो गया था। मैं खाना खाकर जल्दी सो गयी क्यूंकि मुझे सुबह जल्दी उठकर ट्रेकिंग पर जाना था।

भदेरवाह

उस रात हल्की बारिश हुई थी इसलिए सुबह आम दिनों से ज्यादा ठण्ड थी पर जो नज़ारा दोस्त के घर की छत से मुझे देखने को मिल रहा था उसने मुझे भदेरवाह घूमने के लिए और उत्साहित कर दिया। सुबह 6 बजे मेरी टैक्सी आ गयी थी और मेरा पहला पड़ाव था चिंता घाटी जो वहाँ से 30 मिनट की दूरी पर था।

रास्ते में ड्राईवर ने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ से हूँ कितने दिनों के लिए आई हूँ और उनका कहना था कि अकेली लड़की के लिए भदेरवाह घूमना मुश्किल हो सकता है इसलिए अगर हो सके तो मैं किसी को अपने साथ ले जाऊं पर मैंने तो सोच रखा था कि अकेले ही इस जन्नत की सैर करूंगी।

चिंता घाटी

आधे घंटे में मैं चिंता घाटी पहुँच चुकी थी और मुझे सही में लग रहा था की मैं किसी खूबसूरत तस्वीर के अन्दर खड़ी हूँ। चेनाब नदी का तेज़ जल प्रवाह और उसके आस-पास ऊँचें पहाड़ थे जिसकी चोटी बदालों से ढकी थी। इस अद्वित्य खूबसूरती को मैं अपने मन में बसा लेना चाहती थी। प्रकृति के इतने करीब आकर सारी चिंताएं कहीं गायब हो गयी थी। मुझे मेरे दोस्त ने बताया था कि चिंता घाटी का अगर असली अनुभव लेना है तो चिंता नाला और भदेरवाह के बीच थुबा आता है जो वहाँ की सबसे ऊँची चोटी है। मुझे पता था की कुछ दूर बग्गान गाँव के पास थुबा के लिए मैं घुड़सवारी कर सकती हूँ इसलिए मैंने अपनी कैब बग्गान की ओर मोड़ने को कहा। 

कुछ देर में मैं वहाँ पहुँच गयी और बिना देर किए मैंने वहां के लोगों से घुड़सवारी के लिए बात कर ली। कई सालों बाद घोड़े पर बैठी और उंचाई देख कर डर भी लग रहा था कि अगर वहाँ से फिसले तो बस ये आखिरी सफ़र है। बहुत नर्वस थी पर घोड़े वाले ने कहा कि मुझे घबराने की ज़रूरत नहीं है। थोड़ी बारिश हुई है इसलिए हम धीरे चलेंगे। बस फिर शुरू हुआ थुबा का सफ़र और हर मोड़ के बाद मुझे भदेरवाह की खूबसूरती बढ़ती दिखाई दी। कुछ घंटों में हम थुबा पहुँच गये थे। वहाँ पहुँचने के बाद चिंता घाटी का नज़ारा एक अलग अनुभव दे रहा था और मैं बहुत खुश थी कि मैंने यह सफ़र अकले तय किया। बिलकुल शांत माहौल क्यूंकि इतनी सुबह वहाँ यात्री नहीं आये थे, बस चेनाब नदी की आवाज़ सुनाई दे रही थी। मैं उस खूबसूरती को कुछ घंटों तक निहारती रही फिर हम लोग वापस आ गये थे। 

वहाँ से नीचे आकर मैंने खाना खाने का फैसला किया, रास्ते में कई ढाबे थे, मैं एक ढाबे पर रुकी और वहाँ पराठे और लस्सी का आर्डर दिया। मेरे साथ मेरे कैब ड्राईवर भी बैठ गये और मुझे बताने लगे कि यहाँ आम तौर पर कितने यात्री आते हैं और उनके परिवार में कौन कौन है और घर कैसे चलता है। उन्होंने बताया कि वो अपनी बेटी को मेरी तरह निडर बनायेंगे ताकि अपने रास्ते खुद तय कर सके। मुझे ये सुनकर बहुत अच्छा लगा। खाना खाकर वहां से 6 किलोमीटर दूर भदेरवाह के प्रसिद्ध शिव मंदिर की ओर आगे बढ़े।

शिव मंदिर

श्रेय : हिल टेम्पल

Photo of जम्मू के मिनी कश्मीर भदेरवाह की सोलो ट्रिप by Aastha Raj

श्रावन मास था और भदेरवाह को नागों की घाटी कहा जाता है इसलिए हिंदू मान्यता के अनुसार शिव की पूजा आराधना के लिए मंदिर में भीड़ थी। मैंने मंदिर के दर्शन किए। ये मंदिर भदेरवाह का ऐतिहासिक मंदिर है इसलिए भी भीड़ ज्यादा थी। कुछ देर वहाँ रुक कर मैंने आगे बढ़ने का फैसला किया।

भाल पादरी

आसमान में घने बादल थे इसलिए मुझे अंदाजा था की बारिश तेज़ हो सकती है। मैं जल्द से जल्द अपने अगले पड़ाव भाल पादरी तक पहुंचना चाहती थी जो वहाँ से 40 किलोमीटर की दूरी पर था। कुछ घंटों में मैं पादरी भाल पादरी पहुँच चुकी थी और मैंने वहाँ ट्रेकिंग करने का फैसला किया। मैंने कैब ड्राईवर से कहा कि मैं 2 घंटे में वापस आउंगी और मैंने आगे बढ़ना शुरू किया। थोड़ी उंचाई पर चढ़ने के बाद मुझे वहाँ से कई घाटियाँ नज़र आ रही थी और उनके बीच बिलकुल सफ़ेद झील। मैंने ऐसी जगह सिर्फ बाहुबली फिल्म में देखी थी। मैं कई बार थोड़ा रूकती और बैठकर उस खूबसूरती को निहारती रहती। थोड़ा डर भी लग रहा था क्यूंकि मैंने अकेली थी और घाटी पर दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था। अलग अनुभव था वो,शहर के शोर, नौकरी, चिन्ताओं से दूर मैं प्रकृति की गोद में बैठी थी और मन कर रहा था वहीँ बैठी रहूँ। कुछ दूर एक चोटी पर पहुँच कर मैं ध्यान करने बैठ गयी और मैंने आँखें तब खोली जब बारिश की कुछ बूँदें मेरे चेहरे पर पड़ी। बारिश में घाटी के उस उस दृश्य को मैं निशब्द खड़ी देखती रही। मुझे पता नहीं चला कि मैं कितनी देर वहाँ थी। मेरा वहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा था पर मुझे दिख रहा था कि सूर्यास्त करीब है इसलिए मैं नीचे आ गयी। कैब ड्राईवर वहाँ पिछले 3 घंटे से मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मैं फटाफट कैब में बैठ गयी। मुझे भूख तो बहुत लगी थी पर मेरा अगला पडाव अभी बाकी था।

सेओज मैदान

मुझे सेओज मैदान पर सूर्यास्त देखना था। अंकल ने भी कैब तेज़ चलायी और मैं कुछ समय बाद वहाँ पहुँच गयी थी। खुले हरे मैदान और बादल जो मुझे ज़मीन पर दिखाई दे रहे थे। बादलों के बीच से सूर्य की हलकी किरणें उस मैदान पर पड़ रही थी और मुझे एहसास हो चूका था कि मैं जन्नत की सैर पर आई थी और इससे खुबसूरत मैं कुछ नहीं मांग सकती थी। वहाँ लोग उस खूबसूरती की तस्वीरे ले रहे थे और मैं उसे बस निहार रही थी। मैं हर वो लम्हा उस जगह दोबारा जी रही थी जो मैंने सुबह से महसूस किया था। कुछ देर वहाँ आये यात्रियों से बात करके मैं वापस अपने दोस्त के घर चली गयी।

सुबह जम्मू तवी स्टेशन से दिल्ली के लिए मैंने ट्रेन पकड़ ली। मैं वापस दिल्ली जा तो रही थी पर मेरे अन्दर जम्मू और वहाँ की खूबसूरती पूरी तरह से बस चुकी थी। भदेरवाह मेरी ज़िन्दगी की सबसे यादगार और खास यात्रा थी। मैंने मॉनसून का मज़ा ले लिया था और अब भी शहर के शोर के बीच उन खुबसूरत दृश्यों को याद करती हूँ जिन्होंने मेरा मन प्रफुल्लित किया था।

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