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भारत निस्संदेह यात्रियों का स्वर्ग है। भारत जिस तरह के विविध इलाकों और संस्कृतियों में जीता करता है, वह एक मेनू कार्ड जैसा दिखता है जिसमें सैकड़ों प्रकार के व्यंजन और व्यंजन चुनने के लिए होते हैं। भारत का स्वाद चखने के लिए केवल एक मात्र साधन वो है यात्रा ।
यात्रा से विशाल भारत को जाना और परखा जा सकता है भारत के विशाल स्वरूप क़िताब से कुछ अक्षर की बात करने जा रहे हैं।
आमेर किला
आमेर का किला राजस्थान राज्य की पिंक सिटी जयपुर में अरावली पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यह किला अपनी वास्तुशिल्प कला और इतिहास की वजह से जाना-जाता है। आमेर का किला भारत में इतना ज्यादा प्रसिद्ध है कि यहाँ पर हर रोज करीब पांच हजार से भी अधिक लोग घूमने के लिए आते हैं। राजस्थान की राजधानी से सिर्फ 11km की दूरी पर स्थित यह अंबर किला गुलाबी और पीले बलुआ पत्थरों से मिलकर बना हुआ है। यहां आने वाले पर्यटक रोजाना शाम को इस किले से अद्भुद नजारों को देख सकते हैं। आमेर का किला पर्यटकों और फोटोग्राफरों के लिए स्वर्ग के सामान है।
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*आमेर किला का प्राचीन महत्व* प्रांचीन कथा
प्राचीन काल में आमेर को अम्बावती, अमरपुरा तथा अमरगढ़ के नाम से जाना जाता था। कुछ लोगों को कहना है कि अम्बकेश्वर भगवान शिव के नाम पर यह नगर "आमेर" बना, परन्तु अधिकांश लोग और तार्किक अर्थ अयोध्या के राजा भक्त अम्बरीश के नाम से जोड़ते हैं। कहते हैं भक्त अम्बरीश ने दीन-दुखियों के लिए राज्य के भरे हुए कोठार और गोदाम खोल रखे थे। सब तरफ़ सुख और शांति थी परन्तु राज्य के कोठार दीन-दुखियों के लिए खाली होते रहे। भक्त अम्बरीश से जब उनके पिता ने पूछताछ की तो अम्बरीश ने सिर झुकाकर उत्तर दिया कि ये गोदाम भगवान के भक्तों के गोदाम है और उनके लिए सदैव खुले रहने चाहिए। भक्त अम्बरीश को राज्य के हितों के विरुद्ध कार्य करने के लिए आरोपी ठहराया गया और जब गोदामों में आई माल की कमी का ब्यौरा अंकित किया जाने लगा तो लोग और कर्मचारी यह देखकर दंग रह गए कि कल तक जो कोठार खाली पड़े थे, वहाँ अचानक रात भर में माल कैसे भर गया।भक्त अम्बरीश ने इसे ईश्वर की कृपा कहा। चमत्कार था यह भक्त अम्बरीश का और उनकी भक्ति का। राजा नतमस्तक हो गया। उसी वक्त अम्बरीश ने अपनी भक्ति और आराधना के लिए अरावली पहाड़ी पर इस स्थान को चुना, उनके नाम से कालांतर में अपभ्रंश होता हुआ अम्बरीश से "आमेर" या "आम्बेर" बन गया।
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*आम्बेर देवी का चमत्कारी दरबार*
आम्बेर देवी के मंदिर के कारण देश भर में विख्यात है। शीला-माता का प्रसिद्ध यह देव-स्थल भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने, देवी चमत्कारों के कारण श्रद्धा का केन्द्र है। शीला-माता की मूर्ति अत्यंत मनोहारी है और शाम को यहाँ धूपबत्तियों की सुगंध में जब आरती होती है तो भक्तजन किसी अलौकिक शक्ति से भक्त-गण प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। देवी की आरती और आह्वान से जैसे मंदिर का वातावरण एकदम शक्ति से भर जाता है। रोमांच हो आता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं और एक अजीब सी सिहरन सारे शरीर में दौड़ जाती है। पूरा माहौल चमत्कारी हो जाता है। निकट में ही वहाँ जगत शिरोमणि का वैष्णव मंदिर है, जिसका तोरण सफ़ेद संगमरमर का बना है और उसके दोनों ओर हाथी की विशाल प्रतिमाएँ हैं।
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आमेर दुर्ग के प्रमुख ऐतिहासिक महल और स्थल
मानसिंह महल-वर्तमान में आमेर दुर्ग में सबसे प्राचीन महल है। मानसिंह के द्वारा बनवाए हुए हैं । उसने यह महल साधारण रूप में बनवाए थे ।
आमेर के किले में सबसे पुराने महल कदमी महल हैं ।
इन महलों का निर्माण 1237 ई में गद्दी पर बैठे राजदेव ने करवाया था।और इन महलों में बनी एक छतरी में ही आमेर के शासकों का राजतिलक होता था।
मावठा झील
इसका निर्माण 1664 ई. में मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था ।
दिलाराम के बाग –
इसका निर्माण 1664 ई में मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था !
आमेर दुर्ग का दीवान-ए-आम –
आमेर दुर्ग में प्रवेश करते ही चौक में संगमरमर के चालीस खंभों से निर्मित एक विशाल आयताकार भवन है ।
जिसका निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह ने करवाया था ! यहाँ पर राजा का आम दरबार लगता था जहाँ राजा सामान्य जनता से प्रत्यक्ष रूप से मिलता था।
दीवान-ए-खास ( शीश महल ) –
इसका निर्माण मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने करवाया था। और यहां कांच की अद्भुत शक्ति का प्रदर्शन देखने को मिलता है।जिसे शीश महल भी कहते हैं महाकवि बिहारी ने इसे दर्पण धाम कहा है।
गणेशपोल दीवान-ए-आम के बाद –
आमेर दुर्ग में प्रवेश करने के बाद गणेशपोल आता है। इसका निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह ने करवाया । यह पोल 50 फीट ऊँचा व 50 फीट चौड़ा है इसके ऊपर चतुर्भुज गणेशजी मूर्ति पूर्व दिशा की ओर देखते हुए पद्मासन मुद्रा में विराजमान है । फग्र्युसन ने इसके में कहा कि “आमेर दुर्ग का गणेशपोल दुनिया का सबसे अच्छा दरवाजा है ।
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सुहाग मंदिर (सौभाग्य मंदिर) –
गणेशपोल के ऊपर एक आयताकार महल है जहाँ से रानियाँ दीवान-ए-आम का दृश्य देखा करती थीं जिसे सुहाग मंदिर कहते है !l।
जस मंदिर –
(यश मंदिर)दीवान-ए-खास (शीश महल) के ऊपर चूने और गज् मिट्टी से निर्मित जिन पर जामिया काँच के टुकड़े जड़े हुए हैं । जो बड़े कलात्मक प्रतीत होते हैं यहाँ से रानियाँ दीवान-ए-खास का दृश्य देखा करती थीं ।
सुख मंदिर –
दीवान-ए खास के सामने बगीचे की दूसरी तरफ निर्मित सुख मंदिर राजाओं का ग्रीष्मकालीन निवास था । जिसका निर्माण जयसिंह प्रथम ने करवाया था। इसी सुख मंदिर को ‘आराम मंदिर’ के नाम से जानते हैं ।
शिला देवी का मंदिर –
यह आमेर दुर्ग के कछवाहा वंश की इष्ट देवी है । 16वीं शताब्दी में मानसिंह प्रथम द्वारा पूर्वी बंगाल के राजा केदार को हराकर । जस्सोर’ नामक स्थान से अष्ट भुजी भगवती की मूर्ति आमेर लाकर आमेर दुर्ग के जलेब चौक में मंदिर बनवाया ।
जगतशिरोमणि मंदिर –
आमेर दुर्ग के महलों में मानसिंह प्रथम की रानी कनकावती ने अपने पुत्र जगतसिंह की याद में इस मंदिर का निर्मान करवाया था।
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घूमने का सबसे सही समय:-
जनवरी-मार्च के महीने और अक्टूबर-दिसंबर का समय इस जगह की यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय है, क्योंकि इस दौरान मौसम सुहावना होता है। गर्मियों में यह बहुत गर्म और असुविधाजनक हो सकता है और इसलिए, इनसे बचा जाना सबसे अच्छा है।
कैसे पहुँचे :-
विभिन्न शहरों से जयपुर के लिए डीलक्स और राज्य बसें दोनों उपलब्ध हैं। जयपुर से, क्योंकि आमेर किला जयपुर शहर के बाहर 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, निजी टैक्सी बुक करना जयपुर से आमेर किला तक जाने का सबसे अच्छा तरीका है।