
गुजरात के गांधीनगर जिले के रुपाल गांव में हर साल की अंतिम नवरात्रि में घी की नदियां बहती हैं। यहां की मान्यता के अनुसार यहां विराजित वरदायिनी माता को अगर पूरी श्रद्धा से घी चढ़ाया जाए तो भक्त की हर मनोकामना पूरी होती है। इस अवसर पर यहां एक बहुत बड़े उत्सव का भी आयोजन किया जाता है।
इस उत्सव को पल्ली उत्सव के नाम से जाना जाता है। गुजरात में पल्ली का मतलब लकड़ी के ढांचे से होता है जिसमें पांच ज्योतियां होती हैं। इन पांचो ज्योतियों में घी चढ़ाकर मां को अर्पण किया जाता है। एक अनुमान के अनुसार हर साल इस उत्सव में 4 लाख किलो से भी ज्यादा घी मां पर चढ़ाया जाता है। इस पूजा के पीछे एक प्राचीन कथा भी जुड़ी हुई है ये कथा इस प्रकार है......




महाभारत काल में जब पांडवों को अंतिम एक वर्ष का अज्ञातवास बिताना था तब उन्हें यह चिंता हुई की वे अपने अस्त्र-शस्त्र कहां छुपाएंगे। तब उन्होंने घी का अर्पण करके मां वरदायिनी देवी को प्रसन्न किया और अभीष्ट वरदान प्राप्त किया। तब से पांडवों ने यह निश्चय किया की वे हर नवरात्रि की आखिरी रात को मां वरदायिनी देवी की रथ यात्रा निकालकर उन्हें घी चढ़ाएंगे और उसी दिन से यह परंपरा आज भी चली आ रही है
इसी कारण हर साल इस गांव में वरदायिनी देवी की रथ यात्रा निकली जाती है और इस यात्रा में शामिल होने के लिए देश-विदेश से करीब 10 लाख से भी ज्यादा लोग इस गांव में आते हैं। इस गांव में कुल 25 से भी अधिक चौराहे हैं और जब रथ उन चौराहों के पास से होकर गुजरता है तब लोग अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु उनकी पल्ली के ऊपर बाल्टियों एवं अन्य बर्तनों से घी चढ़ाते हैं। जब यह घी ज़मीन पर गिरता है तब कोई भी पशु इसे अपने मुंह से नहीं लगाता है और न ही इस घी से किसी के कपड़े खराब होते हैं। ज़मीन पर पड़े इस घी को यहां के एक ख़ास परिवार के लोग ही उठाते हैं और साल भर इस्तेमाल के लिए अपने पास रखते हैं।
....... जय माँ वरदायनी.......
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