आखिर क्यूँ माँ ज्वाला देवी मन्दिर के आगे, बादशाह अकबर भी नतमस्तक हुए आइये जानें।

Tripoto
16th Jun 2021
Photo of आखिर क्यूँ माँ ज्वाला देवी मन्दिर के आगे, बादशाह अकबर भी नतमस्तक हुए आइये जानें। by Sachin walia
Day 1

माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक ज्वालादेवी का मंदिर भारतीय राज्य हिमाचल के कांगड़ा घाटी में स्थित है। यहां माता की जीभ गिरी थी। इसीलिए इसका नाम ज्वालादेवी मंदिर है। हालांकि इस मंदिर की एक और कथा है जो इंद्र की पत्नी शचि से जुड़ी है।इस मंदिर में माता के मूर्तिरूप की नहीं बल्कि ज्वाला रूप की पूजा होती है जो हजारों वर्षों से प्रज्वलित है।

माँ ज्वाला देवी साक्षात ज्योति रूप

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माँ ज्वाला देवी जी की प्रतिमा

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माँ ज्वाला देवी जी मन्दिर का गुंबद

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इतिहास
सतयुग में महाकाली के परमभक्त राजा भूमिचंद ने स्वप्न से प्रेरित होकर यहां भव्य मंदिर बनाया था। बाद में इस स्थान की खोज पांडवों ने की थी। इसके बाद यहां पर गुरुगोरखनाथ ने घोर तपस्या करके माता से वरदान और आशीर्वाद प्राप्त किया था। सन् 1835 में इस मंदिर का पुन: निर्माण राजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने करवाया था। ज्वालादेवी के एक भक्त ध्यानू हजारों यात्रियों के साथ माता के दरबार में दर्शन के लिए जा रहे थे। इतनी बड़ी तादाद में यात्रियों को जाते देख अकबर के सिपाहियों ने चांदनी चौक दिल्ली में उन्हें रोक लिया और ध्‍यानू को पकड़कर अकबर के दरबार में पेश किया गया। अकबर ने पूछा तुम इतने सारे लोगों को लेकर कहां जा रहे हो? ध्यानु ने हाथ जोड़कर ‍विन‍म्रता से उत्तर दिया कि हम ज्वालामाई के दर्शन के लिए जा रहे हैं। मेरे साथ जो सभी लोग हैं वे सभी माता के भक्त हैं। यह सुनकर अकबर ने कहा यह ज्वालामाई कौन है और वहां जाने से क्या होगा? तब भक्त ध्यानू ने कहा कि वे संसार का जननी और जगत का पालन करने वाली है। उनके स्थान पर बिना तेल और बाती के ज्वाला जलती रहती है। 

अकबर की नाकाम कोशिश
तब अकबर नें अपनी सेना बुलाई और खुद मंदिर की ओर चल पड़ा। अकबर ने माता की परीक्षा लेने या अन्य किसी प्रकार की नियत से उस स्थान को क्षति पहुंचाने का प्रयास किया। सबसे पहले उसने पूरे मंदिर में अपनी सेना से पानी डलवाया, लेकिन माता की ज्वाला नहीं बुझी।

बादशाह अकबर द्बारा माँ को चढ़ाया सोने का छत्र, जो ना जाने कौन सी धातु में तब्दील हो गया था। इसको समझने में विज्ञान भी फेल।

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सोने का छत्र
तब जाकर अकबर को यकीन हुआ और उसने वहां सवा मन सोने का छत्र चढ़ाया लेकिन माता ने इसे स्वीकार नहीं किया और वह छत्र गिरकर किसी अन्य पदार्थ में परिवर्तित हो गया। आप आज भी अकबर का चढ़ाया वह छत्र ज्वाला मंदिर में देख सकते हैं। 

यहाँ आएं कैसे
ज्वाला देवी मन्दिर आने के लिए आप बस टेक्सी से भी आ सकते हैं
बस से आपको दिल्ली से मन्दिर में आने के लिए मात्र 458 किलोमीटर यानी कि 10 घंटे का समय लगेगा।

दोस्तों आपको मेरी यह जानकारी कैसी लगी कमेन्ट बॉक्स में जरूर बताएं।
जय भारत

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