
एक दिन में 200 km साइकिलिंग जब आपका दिमाग आपको ये बोले की आज 9 बजे ही सो जा कल सुबह 2 बजे उठना है. तब होता ये है की आपको बिल्कुल भी नींद नहीं आती और सारा ध्यान 2 बजे उठने पर लग जाता है. बहुत से खयाल आते हैं अलार्म सही से रखा है या नहीं. अलार्म बजेगा या नहीं. कुछ समान छूट न जाए. सब कुछ तैयारी कर ली या नहीं कुछ रह तो नहीं गया. एसे ही 75 खयाल शुक्रवार शाम को मेरे जहन मे थे. सोना मुश्किल हो रहा था, आँखों से नींद मेरी कल की मंजिल की तरह कोसों दूर थी. बार बार सोने की कोशिश कर रहा था, कुछ समय बाद कोशिश को विफल होते देख फेसबुक से सुकून लेने की कोशिस कर लेता था. फिर दिमाग जोर देता भाई सो जा कल सुबह 2 बजे हाँ हाँ 2...... बजे उठना है. मैं फिर से सोने की कोशिश करने लगता, कुछ समय बाद फिर वो ही फेसबुक, फेसबुक. 11:30 तक तो ये ही सिलसिला चलता रहा उसके बाद नीद आ गई. लेकिन फिर से नीद 1 बजे खुल गई, फिर समझ गया अब सोने की कोशिस करना बेमानी ही है.

उठ के सोचा चलो अब कल जो तैयारी की थी वो देख लेता हूं. दोस्तों राइड में जाने से पहले भी बहुत तैयारी करनी पढ़ती है, जैसे - राइडिंग गल्बज, हेल्मेट, चश्मा, रेन कोट,वालेट, धूप से बचने के लिए गले और हाथो के कवर ये सब रखना और आज कल कोरोना की वजह से मास्क भी. और भी कुछ दूसरी तैयारी होती हैं जैसे - स्मार्ट वाच चार्ज करना, नाइट लैम्प चार्ज करना, साइकिल के टायरों का एयर प्रेशर चेक करना, गोप्रो कैमरा चार्ज करना और नीले दांत वाले स्पीकर यानी ब्लुटूथ स्पीकर चार्ज करना, वैसे जब से मेरा कटा है तब से मैंने ब्लूटूथ स्पीकर चार्ज करना छोड दिया है, गाना सुनने से ज्यादा याद आती है. अब कमेंट्स कर के ये कोई नहीं पूछेगा कब कटा, किसने काटा और क्यू काटा. न कोई उसको जनता है और न ही मैं कुछ बताने वाला, रुलाओगे तुम सब यार. अरे यार तुम सब मुझे भटका देते हो. कहाँ था मैं हाँ सारी तैयारी का जायजा ले कर फिर से अपन ने थोड़ा भैस बुक को टटोला. फ्रेस हो कर अपन बिल्कुल रेडी था आज की लंबी राइड के लिए. किसी ने पूछा था घुमक्कड़ी क्या है अब ये तो मैं सही से बता नहीं सकता लेकिन घुमक्कड़ कैसा होता है ये जरूर बता सकता हूँ. घुमक्कड़ पागल होता है, सनकी होता है, आवारा होता है, किसी की न सुनने वाला होता है. बहुत ईमानदार होता है, प्रकृति प्रेमी होता है, मृदुभाषी होता है, भावनाओ को समझने वाला होता है, लोकल संस्कृति का सम्मान करने वाला होता है और भी पता नहीं क्या क्या होता है लेकिन कभी भी एक घटिया इंसान नहीं हो सकता. माँ से और बीवी से कभी मत पूछ लेना घुमक्कड़ी और घुमक्कड़ के बारे में वर्ना दोबारा पूछने लायक नहीं रहोगे.

तो दोस्तों अब मुद्दे पर आता हूं,ग्यान तो बहुत दे दिया तुम सब को. सुबह सुबह 2.30 बजे निकल गया घर से वैसे इसको सुबह नहीं आधी रात ही बोला जाय तो ज्यादा सही है. गोराईमारी जहां मैं रहता हूं वहाँ से 5 km सोलमारा पहुंचा तो अनुज ने भी मुझे जॉइन कर लिया. अंधेरा काफी था रात को बस इक्के दुक्के वाहन ही सड़कों पर अपनी दस्तक दे रहे थे. कुछ और आगे चल के मिशन चाराली पर हम दोनों को अपना तीसरा पार्टनर लोरेंज भी मिल गया . अब शुरू हुआ हम तीनों का सफरनामा. सफर बहुत लंबा था तो पहले से ही तेज साइकिल चलाना और घर से जल्दी निकालना हमारे लिए बहुत जरूरी था. घर से जल्दी निकल कर एक काम तो हम कर चुके थे अब बारी थी दूसरे काम की मुझे पता था तेज चलने की जिम्मेदारी मुझे ही लेनी पड़ेगी. मैंने शुरू से ही तेजी से पैड़ल देना शुरू कर दिया. तेज चलने मे भी दो बातों का ध्यान देना था. एक अगर ज्यादा तेजी से चलेंगे तो जल्दी थकान हो सकती है. चलना लंबा है जो जल्दी थकान होने के वजह से मुश्किल भी हो सकता है. दूसरी बात अगर थोड़ा स्पीड कम हो गई तो वहां ज्यादा समय नहीं दे पाएंगे और लौटने मे भी अंधेरा हो सकता है. दोनों बातों का ध्यान रखते हुए हमने करीब 26, 27 की स्पीड मेंटेन रखी. बहुत जल्द ही हमलोगों ने डेकयाजुली पार कर लिया . कोशिश ये थी की उजाला होने से पहले जितना ज्यादा दूरी तय कर ली जाय तो बेहतर होगा.

डेकयाजुली के बाद सिराजुली कब आया और कब गया पता भी नहीं चला. अच्छा आपसी तालमेल अब तक हम तीनों का बन चुका था. अब हम एक दूसरे को सही से समझने लगे थे. पहला बंदा अगर थोड़ा थक जाता था तो दूसरा बंदा चार्ज ले लेता बाकी दोनों उसके पीछे पीछे लग जाते . बहुत देर तक ऐसा ही चलता रहा. अब बारिश भी शुरू हो चुकी थी. लंबा जाना था तो हमने ज्यादा समान न रखने का सोचा था और रेन कोट भी नहीं रखा. बारिश तेज होने लगी थी और अब हवा भी चलने लगी थी. अब हमारी स्पीड भी कम होने लगी . कुछ समय बाद हमलोग पूरा भीग चुके थे. जूतों के अंदर पूरा पानी पानी हो गया था. मोजे पूरे गिले हो चुके थे लेकिन हमने चलना नहीं छोड़ा. करीब 6 बजे हम लोग रोवता चराली पहुंच चुके थे. दोस्तों आपको बता दूँ चराली का मतलब आसमी मे चौराहा होता है. यहाँ हमने एक एक चाय पी और थोड़ा बिस्किट खाये और आगे की योजना बनाई. रोवता चराली में गूगल मैप से देखने से पता चला यहां से अपनी मंजिल अब केवल 24 km दूर रह गई है . अब हमने यहाँ लंबा रुकने का मन बना लिया

1 घण्टे से भी ज्यादा वहाँ रुक कर हम फिर से चल पड़े अपनी मंजिल की ओर 8 बज कर 15 मिनट पर हम लोग पहुंच गये भैरवकुंड. अब आपको भैरवकुंड के बारे में थोड़ा जानकारी दे देता हूं. भैरवकुंड- भैरवकुंड असम,भूटान और अरुणाचल का त्रि-जंक्शन है. ये असम के उदलगुरी जिले से 22 km की दूरी पर स्थित है. ये एक फेमस पिकनिक स्पॉट है. यहाँ पर भूटान की सीमा के 2 Km अंदर एक बहुत ही ज्यादा फेमस शिव मंदिर है जहां भक्त शिवरात्रि मे जाना पसंद करते हैं.जाम्पनी नदी, जो भूटान में उत्पन्न होती है, और भैरबी नदी धनशिरि नदी बनाने के लिए यहाँ विलीन हो जाती है। यहाँ जो कुंड है उसमें एक शिव की प्रतिमा जैसी आकृति बनती है इस लिए इसका नाम भैरवकुंड है. 1 घण्टे तक हम लोग नदी किनारे बैठे रहे और मुझे छोड के बाकी 2 लोगों ने वहाँ नहाना भी किया. वहाँ से हम लोग निकले बॉर्डर के लिए. जब बॉर्डर पर भारत के गेट में पहुंचे तो पता चला अभी कोरोना की वजह से गेट बंद है और भूटान जाना अभी संभव नहीं है. लास्ट टाईम मैं जनवरी मे यहां आया था तब covid-19, 1 महीने का छोटा बच्चा था और उस से किसी को कोई दिक्कत नहीं थी बॉर्डर खुले थे शिवमंदिर भी गया था, 2 पैग भूटानी व्हिस्की के भी लगाये थे. 2 बॉटल वाइन भी ले के आया था. तब से अब तक कोरोना 6 महीने से उप्पर का हो गया है और अब तो उसका अन्न- प्रासन भी हो गया है अब उसका कहर इतना बड़ गया की देशों की सीमाओं पर भी ज्यादा बंधन बड़ गये जिस वजह से सीमाएँ अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दी गई हैं. Covid- 19 से अब 2020 हो गया है. खैर इस बार अंदर नहीं जा पाया. कुछ समय बाद अनुज का दोस्त सिद्दार्थ भी हमसे मिलने वहाँ आ गया और उसके हाथ मे वो सब समान था जिसकी उस समय हमको सब से ज्यादा जरूरत थी. अंधे को क्या चाहिए 2 आँखें और भूखे को खाना. भूख बहुत जोर से लगी थी. खाना मिलते ही हम उस पर टूट पडे. सिद्धार्थ 6 पानी की बोतल भी लाया था अपने साथ. अगर आपने कभी लंबी साइकिलिंग की होगी तो आपको पता होगा साइकिल चलाते हुए सब से ज्यादा प्यास ही लगती है. पानी की भरी बोतलों को अपनी अपनी खाली पडी बोतलों मे खाली करने के बाद बहुत ही सुकून की अनुभूति हुई हम सब को.

करीब 11 बजे हम लोगों ने मन बनाया की अब वहाँ से चला जाये घुमते फिरते 100 km के आस पास हमको वहाँ ही हो गये थे. मेरे जहन मे एक बात चल रही थी मगर मैं किसी को बताना नहीं चाहता था. अभी तक एक दिन में मैंने 194 km साइकिलिंग की थी और मैं चाहता था आज ये रिकॉर्ड भी तोड़ दिया जाय और साथ ही 200 km के जादुई आंकड़े को भी छू लिया जाये. अब जरूरत थी इसके लिए तिकड़म भिड़ाने की. मैंने अपने दोनों साथियों से बोला मैं एक शॉर्ट रास्ता जानता हूं जिस से हम घर जल्दी पहुंच जाएंगे और 15 km कम भी होगा. वैसे लोकल वो दोनों थे लेकिन रास्ता उनको मैं बता रहा था ये भी ग़ज़ब था. दोनों ये सुन कर खुश हुए बोले सही है तब तो वहीँ से ही चलते हैं. मैंने उनको एक बात और बतायी की अगर हम शॉर्ट रास्ते से जायेगे तो हमको अरुणाचल के पहाड़ी रास्तो से हो कर जाना होगा जहां कभी कभी साइकिल को धकेल कर भी ले जाना होगा. दोनों ने मेरी ओर देखा और पूछा कितना km पैदल साइकिल को धक्का देना पड़ेगा मैंने बोला बस 500 मीटर. जब की मैं उस रास्ते से अच्छे से वाकिफ़ था मुझे पता था हमको कम से कम 2 km तक तो साइकिल को धक्का लगाना ही पड़ेगा. ये सब बता के मैं दोनों का आत्मबल तोड़ना नहीं चाहता था भैया हम तो पहाड़ी हैं ट्रेकिंग का भी अच्छा खासा अनुभव है,लेकिन बाकी दोनों को पता भी नहीं था उनके साथ क्या क्या होने वाला है आगे. फिर से चल पड़े अब मंजिल कुछ और थी और रास्ते भी कुछ और.

1 km चलने के बाद ही पहाड़ी रास्तो की शुरुवात हो चुकी थी. अब अपनी जोर आजमाइश का समय भी आ चुका था. पहली चडाई बहुत अराम से पार कर ली फिर जो ढलान मिली उसने मानो जन्नत ही दिखा दी हो. करीब 4 km चलने के बाद हम लोग उस जगह पर थे जहां से अरुणाचल का बॉर्डर शुरू हो जाता है और वो बंद था. वहाँ बहुत रिक्वेस्ट की बोला हम आगे से असम वाला रास्ता पकड़ के तेज़पुर को चले जाएंगे लेकिन पुलिस वाला भाई बिल्कुल नहीं माना. कुछ समय बाद उसने उप्पर की ओर इशारा किया और बताया ये ही असम की रोड है जो आगे से घूम कर यहां पहुंची है अगर कंधे मे साइकिल ले कर उप्पर तक चडाई कर के उस रास्ते तक जा सकते हो तो all is yours. ऐसे कामों में मैं बहुत आगे हूं जब तक बाकी दोनों सोच रहे थे कैसे जायेंगे जा भी पायेंगे या नहीं तब तक तो मैं साइकिल उठा के चल पड़ा था. मुझे देख दोनों भी अपने कंधों मे साइकिल उठाये मेरे पीछे रास्ता लग गये. जब तक हम किसी काम को दिमाग से नहीं कर लेते तब तक वो शरीर से नहीं हो सकता. ये काम दिमाग से तो मैं पहले ही कर चुका था बस अब शरीर से करना बाकी था. बहुत आराम से हम लोग ऊपर वाली सड़क में पहुच चुके थे. थोड़ा सा साँस जरूर फूल रही थी लेकिन कुछ समय बाद वो भी नॉर्मल हो गई. फिर अपनी उड़ान चालू हो गई. जब लास्ट टाईम इस रास्ते से आया था तो बहुत बार साइकिल से उतर के साइकिल धकेली थी लेकिन इस बार मन मे सोच लिया था कोशिश होगी जितना हो सके साइकिल से ही चडाई चडनी है, नीचे नहीं उतरना. पहली चडाई जहां मैं लास्ट टाईम उतरा था इस बार मैंने बिना उतरे ही पार कर ली ऐसे ही दूसरी भी. जब पीछे मूड के देखा तो पीछे कोई नहीं था. मैं वहाँ ही रुक गया कुछ समय बाद साथ के दोनों लोग साइकिल को धक्का लगा के और मुझे गाली देते हुए पीछे से आ रहे थे. एक बार फिर से थोड़ा सा चले ही थे तो ऐसी चडाई सामने आ गई की सब को उतरना ही पढ़ा.









करीब 1 km तक हम लोग पैदल ही चले. रास्ते मे भू स्खलन भी हुआ था और कीचड भी बहुत था. आधे पैर कीचड़ के अंदर और साइकिल भी कीचड़ के अंदर होते हुए बहुत मुश्किल से पार की. साथ के दोनों लोगों का चेहरा देखने लायक था बहुत गालियां दे रहे थे दोनों मुझे. उन गालियां की संख्या और स्पीड में और भी ज्यादा इजाफा हो गया जब दोनों ने मील के पत्थर पर लिखा देखा तेज़पुर 86 km. तब दोनों को समझने मे देर नहीं लगी की ये सब ड्रामा मैंने सिर्फ अपने 200 km के लिए किया था . अब दोनों कर भी क्या सकते थे. थकान बहुत हो चुकी थी उस समय तो बस मन ये ही कर रहा था बहुत हुआ पैडल-पैडल अब तो साइकिल को ट्रक मे रखा जाय और चला जाय तेज़पुर की ओर. लेकिन ऐसा करना मेरी फितरत मे नही था. सही रोड आने पर एक बार फिर हम चल दिये ओरांग की ओर. ओरांग से कुछ आगे जा कर हम लोगों ने खाना भी खाया. कुछ आगे जा कर एक दादी जी मिली जिन्होंने मुझे आसामी मे कुछ बोला मैं उनके इशारे को समझ गया मैंने बोला ये कैमरा है दरसल उनका इशारा मेरे हेल्मेट मे लगे गोप्रो की ओर था. फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने कुछ और बोला मैंने हाँ मे सर हिला दिया वो कुछ और बोलने ही वाली थीं मैंने फिर हाँ मे सर हिला दिया. समझ तो कम ही आ रहा था लेकिन जो भी उन्होंने बोला उसका जवाब हाँ ही था ये मुझे पता था. 5 बजे करीब चलते चलते हम लोग अपने अपने घर आ गए. आज मेरा पिछला रिकार्ड भी टूट गया. आज एक नया रिकार्ड बना 200 km साइकिल चलाने का और ये भी जल्द ही टूट जायेगा.



