हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट
बाँधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट
कबीर के इस दोहे का अर्थ है कि सब्जी मंडी में हीरा निकाल कर नहीं बेचना चाहिए। पोटली को बाँध के अपने रस्ते निकलना चाहिए।
अर्थ ये है कि आध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा आध्यात्मिक लोगों में की जाए तो ही उसका मूल्य है। सांसारिक लोगों से तो सांसारिक बातें ही करनी ठीक है।
इसी बात के मद्देनज़र भारत के पर्यटन विभाग ने aआध्यात्म और संगीत प्रेमियों के लिए हाल ही में कबीर यात्रा का आयोजन किया था, जिसका आरम्भ और समापन बड़ी धूम-धाम से हुआ।
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क्या थी ये कबीर यात्रा
कबीर यात्रा राजस्थान का सबसे बड़ा लोक संगीत फेस्टिवल है, जिसमें शिरकत करने वाले श्रोता और संगीतकार राजस्थान की कई मशहूर जगहों पर एक साथ घूमते हुए जाते हैं और हर सुबह-शाम लोक संगीत के रस में डूबे रहते है।
हर साल आयोजित की जाने वाली इस यात्रा में कई जाने-माने संगीतकार और गायक शामिल होते हैं, और अपनी कला के ज़रिये प्यार, भक्ति और सद्भाव का सन्देश देते हैं।
इसे कबीर यात्रा ही क्यूँ कहते हैं
बहुत अच्छा सवाल है। अगर आप कबीर को जानते हैं तो आप इस नाम के पीछे छिपा मतलब भी समझ जाएंगे और ये भी कि ये यात्रा क्यों आयोजित की जाती है। बहुत दिलचस्प कारण हैं, तो समझ-समझ कर पढियेगा।
पहले हम समझते हैं कि कबीर कौन थे
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15वीं शताब्दी के कबीर नाम के इस बन्दे को कवि भी कह सकते हैं और संत भी। वैसे पेशे से तो कबीर बुनकर थे, मगर उनका असली काम कविताओं और दोहों के ज़रिये समाज में प्रेम और सद्भाव लाने का था। भक्ति के दोहों ने ही 15 वीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन को चिंगारी को हवा दी, जिसके चलते एक नया धर्म निकलकर आया, जिसका नाम था-सिख धर्म।
आज भी गुरुग्रंथ साहिब में कबीर के कई दोहे पढ़े जा सकते हैं।
कबीर के कई दोहों में हिन्दू-मुस्लिम धर्म की कुरीतियों और आडम्बरों की खुलकर निंदा की है।
कट्टरपंथी मुस्लिमों के लिए कबीर कहते हैं :
कंकर-पत्थर जोरि के, मस्जिद लई बनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे, का बहरा भया खुदाय
अर्थ है कि मस्जिद पे चढ़ कर तुम रोज़ सुबह मुर्गे की तरह बांग देते हो, तुम्हारा खुदा बहरा हो गया है क्या ?
कट्टरपंथी हिन्दुओं के लिए कबीर ने कहा :
पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहाड़
घर की चाकी कोई न पूजे, जाको पीस खाये संसार
यानी पत्थर की मूर्ती पूजने से अगर भगवान् मिलता हो तो मैं पूरा पहाड़ ही पूज लूँगा। मगर भगवान् तो मुझे मेरे घर में ही मिलेगा, मेरे माता-पिता, बीवी-बच्चों, संगी-साथियों में।
ऐसा कबीर ने उन्हीं कट्टरपंथी धार्मिक लोगों के लिए कहा है जो मुँह पर तो ऊपरवाले का नाम रखते हैं, मगर दिल में किसी के लिए भी छँटाक भर का प्यार नहीं होता। ये तीर धर्म के उन सौदागरों के लिए हैं, जो धर्म के नाम पर भोली-भाली जनता पर राज करना चाहते हैं।
कबीर लोगों को अपने मन में झाँक कर देखने का सन्देश देते हैं, कहते हैं कि शैतान दिल में ही बसा है। उसे पहचानो और निकाल फेंको। तभी खुदा मिलेगा। कहते हैं :
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलाया कोई
जो दिल खोजै अपना, मुझसे बुरा न कोई
कहते हैं कि मुस्लिम परिवार ने बचपन में उन्हें अपनाया और पाला, मगर कई बुद्धिजीवी कहते हैं कि कबीर के पुरखे नाथ सम्प्रदाय के भी थे। उनके दोहों में भी नाथ सम्प्रदाय की कई गूढ़ बातों का ज़िक्र मिलता है।
कबीर का धर्म कोई भी रहा हो, मगर उनके जीते जी तो हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही कबीर के दुश्मन बने रहे। मगर कबीर के मरने के बाद दोनों ही धर्म के लोग कबीर पर अपना हक़ जताते हैं। कबीर के धर्म का कोई ठिकाना नहीं।
इनकी इसी धर्म निरपेक्षता के कारण कबीर के दोहों को समाज के कई सम्प्रदायों ने अपनाया और सुहाने गीत-संगीत में ढाल दिया। कई सदियों से चले आ रहे इन्हीं गीतों की प्रस्तुति कबीर यात्रा में देखने को मिलती है।
माटी से जुड़े कई कलाकार कबीर यात्रा में शामिल होते हैं। इस साल 2019 की कबीर यात्रा में कई जाने-माने कलाकार-संगीतकार-गायक प्रेम का सन्देश देने को शामिल हे थे। लोक संगीत के मंझे हुए कलाकार जैसे :
राजस्थान के महेशा राम
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बैंगलोर कर्नाटक से शबनम वीरमणि
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पश्चिम बंगाल से लक्ष्मण दास बौल
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मुंबई महाराष्ट्र से स्मिता बेल्लूर
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धर्मशाला हिमाचल से राइजिंग मलंग
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मुंबई महाराष्ट्र से कबीर कैफे
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जैसलमेर राजस्थान से दापु खान
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मालवा गुजरात से कालूराम बामनिया
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जैसलमेर राजस्थान से सकुर खान
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कच्छ गुजरात से मूरालाला
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आप सब कितने पहुँचे हुए कलाकार हैं, ये जानने के लिए आप इनके नाम का सिर्फ एक गूगल सर्च कर लें।
यात्रा का प्रोग्राम
2 अक्टूबर 2019 को जयपुर से शुरू हुई इस यात्रा में यात्री बस में बैठ कर गाते-बजाते सीकर पहुँचे।
फिर 3 अक्टूबर की सुबह और शाम भक्ति संगीत में रंग कर 4 अक्टूबर को झुंझुनू जिले के धुन्द्लोद गाँव में यात्रा पहुँची।
5 अक्टूबर की सुबह-शाम सीकर जिले के फतेहपुर गाँव में खुदा की बंदगी करके 6 अक्टूबर को सीकर जिले के ही रामगढ़ गाँव में यात्रियों ने डेरा डाला।
7 अक्टूबर को फलोदी गाँव में भजन करने के बाद 8 अक्टूबर को यात्रा जैसलमेर पहुँची, जो यात्रा का आखिरी पड़ाव था। इसके बाद सभी बसें जयपुर के लिए रवाना हो गयी।
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रुकने की व्यवस्था
यात्रियों के रुकने के लिए मंदिरों की डॉरमिटरी में गद्दे और कम्बलों की अच्छी व्यवस्था थी।
खाने, पीने और नहाने-धोने की व्यवस्था को भी बड़ी अच्छी तरह से संचालित किया गया था।
पुलिस का लगातार पहरा होने के कारण सभी सुकून से यात्रा के मज़े ले रहे थे।
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यात्रा का खर्च
4000 रुपये के खर्चे में आने-जाने, रहने-सोने, खाने-पीने और सुरक्षा के इंतज़ाम के साथ ही 6 दिन तक ऐसे जाने-माने कलाकारों को सुनने का मौका था।
अगर आप विद्यार्थी हैं, या आर्थिक रूप से उतने सशक्त नहीं है तो आपके लिए डिस्काउंट की सुविधा भी थी। लेकिन अगर आप दान देने के हिसाब से ज़्यादा पैसे देना चाहें तो वो सबसे बढ़िया।
क्यों ना आप इतने बढ़िया इंतज़ाम और संगत के लिए 4000 रुपये से ज़्यादा ही दें, और 4000 रुपये के न्यूनतम शुल्क को जरूरतमंद लोगों के लिए रहने दें। अगर आप एक बार इसमें शिरकत कर लेते तो पता चलता कि इतनी बढ़िया संगत का कोई मोल नहीं था। इसके लिए 4000 क्या 40000 रुपये भी कम है।
इस बार की कबीर यात्रा में तो आप नहीं जा पाए, मगर अगले साल इस यात्रा में ज़रूर जाना। यात्रा में जाने के लिए रजिस्ट्रेशन आप वेबसाइट पर आसानी से कर सकते हो।
यात्रा की दिलचस्प तस्वीरें और वीडियो देखने के लिए इनका फेसबुक पेज अभी फॉलो कर लें।
तो मिलते हैं फिर से अगले बार की कबीर यात्रा में। अपने हेडफोन और कैमरा घर पर ही छोड़ आना, और दोनों कान और आँखें खोल कर भक्ति रस को अपने अंदर समा लें तो अच्छा है।
मैं भी आपको संतों-कलाकारों की संगत में वही मिलूंगा।