
नाथू ला पास से लौटने के बाद हम बाबा हरभजन सिंह मंदिर पहुँचे। तापमान करीब 4°C के आसपास था और चारों तरफ बर्फ की चादर बिछी हुई थी।
बाबा हरभजन सिंह का जन्म पंजाब में हुआ था। वो सिख रेजिमेंट में कैप्टन थे। 1968 ई° में वो 22 साल की उम्र में 14500 फीट की ऊँचाई पर बर्फ में दब जाने के कारण वो शहीद हुए। 3 दिन बाद उनका शरीर वहाँ मिला। कहा जाता है कि उन्होंने खुद सर्च पार्टी को अपना शव खोजने में मदद की। आज भी वो वहाँ के सैनिकों के सपनों में आके उन्हें गुप्त जानकारियाँ देते हैं। वहाँ के सभी सैनिक बाबा के मंदिर में जाकर उनका आशीर्वाद लेके ही अपना कार्य शुरू करते हैं। भारत चीन युद्ध के समय बाबा ने 3 दिन पहले ही सैनिकों के सपनों में आकर उन्हें युद्ध के बारे में बता दिया था। ऐसा माना जाता है कि वो आज भी इस देश की रक्षा करते हैं। उन्हें आज भी ड्यूटी पर माना जाता है। मंदिर में उनका एक निजी कमरा बनाया हुआ है और एक ऑफिस का कमरा बना हुआ है।




वहाँ पहुँचने के बाद हमें इनकी और भी बहादुरी के किस्से सुनने को मिले। जब भी यहा भारत और चीन की मीटिंग्स होतीं हैं तो बाबा की भी एक कुर्सी लगाई जाती है। इन्हें आज भी ड्यूटी पर माना जाता है और इनकी सैलरी इनके माँ के पास हरेक महीने पहुँचा दी जाती है। यह जगह प्राकृतिक सुंदरता से भरी हुई है। चारों तरफ पहाड़, बर्फ की चादर, ठंडी ठंडी हवा मानों उस जगह को पवित्र बना रहीं हों।


यहाँ विश्व का सबसे ऊँचाई पर बना भगवान शिव की मूर्ति भी लगी हुई है।

हमने यहाँ बाबा का प्रसाद लिया और इस जांबाज के किस्से सुन कर बाबा के सोच में डूब गए। सचमुच यह एक अलग अनुभव था। एक विश्वास, श्रद्धा, बहादुरी, देशभक्ति का संगम है बाबा हरभजन सिंह का यह मंदिर जो आपको देशभक्ति से ओतप्रोत करता है। सिक्किम आए हुए सभी टूरिस्ट यहाँ आते हैं बाबा के दर्शन करने।
हम यहाँ और कुछ देर रुकना चाहते थे, लेकिन तभी मौसम खराब होने लगा और वहाँ के आर्मी के जवान ने हमें वहाँ से निकलने के लिए कहा। वहाँ की यादों को अपने दिल में समेटे हुए हम लौट आए।







